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आयुर्वेदिक उपचार करके अनियमित मल त्याग से आराम पायें

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अनियमित मल त्याग (या ग्रहणी) एक आम पाचन विकार है जो सारी दुनिया में बहुत से लोगों को होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार यह तनाव और चिंता करने की वजह से होता है। लेकिन अभी तक कोई भी इसका वास्तविक कारण नहीं जानता है। इस बीमारी के लक्षणों को पहचानना और इसके मूल कारण व अपने स्वास्थ्य की रुपरेखा के आधार पर शीघ्र उपचार करवाना बहुत ज़रूरी है।

बार-बार पेट में दर्द होना और पेट फूलना एक सामान्य पाचन विकार के लक्षण हैं जिसे अनियमित मल त्याग कहते हैं। दुनिया में अनेक लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं और यह एक चिरकालिक समस्या है। कई बार लोग इसका उपचार नहीं करवाते हैं। तनाव और पौष्टिक भोजन न खाने की वजह से यह बीमारी और खराब हो सकती है। इसलिए आराम पाने के लिए शीघ्र निदान और इलाज करवाना ज़रूरी है।

आपको निम्नलिखित लक्षणों की ओर ध्यान देना चाहिए:

  • पेट में दर्द और पेट फूलना

  • जी मिचलाना

  • सिरदर्द और थकान

  • चिरकालिक कब्ज़ या दस्त

  • मल में बलगम / रक्त

ये सामान्य लक्षण हैं और अस्थायी हो सकते हैं। लेकिन अगर ये बार-बार दिखाई देते हैं तो आपको ठीक से जांच करवानी चाहिए क्योंकि ये अनियमित मल त्याग के संकेत हो सकते हैं। अक्सर अधिक मात्रा में मद्य, कैफीन या कार्बोनेटेड पेय का सेवन करने से यह समस्या बढ़ जाती है। आजकल, विषैले पदार्थ और प्रत्यूर्जता भी इस परेशानी को बढ़ा सकते हैं, जैसे दुग्ध शर्करा या लासा उत्पादों के प्रति असहिष्णुता।

आयुर्वेदिक नजरिया:

आयुर्वेद अनेक भिन्न पाचन विकारों के बारे में बताता है जो अनियमित मल त्याग की श्रेणी में आ सकते हैं। इस प्रकार के मामलों में कोई भी दोष बढ़ा हुआ हो सकता है और ज्यादातर विषैले पदार्थ उपस्थित होते हैं। इस समस्या का गहराई से उपचार करना चाहिए। सतही समाधान जो सिर्फ़ लक्षणों को शांत कर देते हैं पर्याप्त नहीं हैं। आयुर्वेदिक उपचार में मूल कारण को पहचाना जाता है। निदान परिवर्जन किया जाता है। यह व्यक्ति की प्रकृति को समझकर (प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट प्रकृति होती है) किया जाता है। बढ़े हुए दोषों को कम किया जाता है, पाचन तंत्र को पुनः सुचारू रूप से काम करने लायक बनाया जाता है और एकत्रित विषैले पदार्थों को हटाया जाता है। ये सब दवाई, पथ्य और व्यक्ति की स्वास्थ्य रूपरेखा के आधार पर विशिष्ट राय देकर किया जाता है। ज्यादातर तनाव इस विकार का मुख्य कारण होता है इसलिए उपचार में रहन-सहन में बदलाव लाने को प्रधानता दी जाती है ताकि दीर्घकालीन सकारात्मक लाभ हो सके।

इस प्रकार जीवा आयुर्वेद इस बीमारी के मूल कारण से निपटने के लिए अपना आयुनिक तरीका इस्तेमाल करता है। वह आराम देने के लिए सिर्फ़ लक्षणों का ही नहीं बल्कि बीमारी के आधारभूत कारणों का भी उपचार करता है।

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